BCCI
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी BCCI दुनिया के सबसे बड़े और प्रभावशाली क्रिकेट बोर्डों में शामिल है। टीम इंडिया की लोकप्रियता भी किसी से छिपी नहीं है। इसके बावजूद घरेलू अंतरराष्ट्रीय मैचों के लिए बोर्ड को नया टाइटल स्पॉन्सर खोजने में मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है।
यह स्थिति इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि BCCI ने टीम इंडिया के घरेलू मैचों के टाइटल स्पॉन्सरशिप राइट्स के लिए इस बार रिजर्व प्राइस बढ़ाकर 4.85 करोड़ रुपये प्रति मैच कर दिया है। पिछली डील में IDFC First Bank करीब 4.2 करोड़ रुपये प्रति मैच का भुगतान कर रहा था। यानी इस बार बोर्ड ने कीमत में लगभग 15.5 फीसदी की बढ़ोतरी की है।
13 अगस्त की बोली प्रक्रिया की समयसीमा के बाद भी कोई ऐसी डील सामने नहीं आई जो BCCI की उम्मीदों पर खरी उतरती हो। अब बोर्ड संभावित कंपनियों के साथ सीधे बातचीत के जरिए नया स्पॉन्सर तलाशने की कोशिश कर रहा है।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर टीम इंडिया जैसी बड़ी क्रिकेट टीम के लिए कंपनियां इतनी बड़ी रकम लगाने से क्यों पीछे हट रही हैं? क्या इसका कारण विराट कोहली और रोहित शर्मा जैसे सुपरस्टार्स का सीमित अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम है या इसके पीछे कोई बड़ी कारोबारी वजह है?
विराट-रोहित के दौर के बाद क्या बदला?
भारतीय क्रिकेट में विराट कोहली और रोहित शर्मा की लोकप्रियता का असर सिर्फ मैदान तक सीमित नहीं रहा है। दोनों खिलाड़ी लंबे समय तक टीम इंडिया के सबसे बड़े ब्रांड चेहरों में शामिल रहे।
अब दोनों दिग्गज टेस्ट और टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले चुके हैं और मुख्य रूप से वनडे क्रिकेट में ही नजर आते हैं। ऐसे में द्विपक्षीय क्रिकेट में उनका नियमित तौर पर उपलब्ध नहीं होना निश्चित रूप से ब्रांड के नजरिए से एक बदलाव है।
हालांकि, इसे BCCI को स्पॉन्सर नहीं मिलने की एकमात्र वजह मानना सही नहीं होगा।
टीम इंडिया की लोकप्रियता अभी भी बहुत बड़ी है। असली सवाल यह है कि कंपनियां BCCI द्वारा तय कीमत पर मिलने वाली संभावित पहुंच और निवेश के बदले मिलने वाले लाभ को कैसे देख रही हैं।
BCCI की 4.85 करोड़ रुपये प्रति मैच की मांग
नए टाइटल स्पॉन्सरशिप राइट्स के लिए BCCI ने रिजर्व प्राइस बढ़ाकर 4.85 करोड़ रुपये प्रति मैच कर दिया है।
पिछली डील में IDFC First Bank ने लगभग 4.2 करोड़ रुपये प्रति मैच का भुगतान किया था। यानी बोर्ड इस बार अपने अधिकारों की कीमत ज्यादा रखना चाहता है।
BCCI के नजरिए से टीम इंडिया के घरेलू मुकाबलों की लोकप्रियता को देखते हुए यह कीमत उचित हो सकती है। लेकिन संभावित स्पॉन्सर्स के लिए सवाल यह है कि इतने छोटे अधिकार चक्र में इस निवेश से पर्याप्त व्यावसायिक लाभ मिलेगा या नहीं।
यही अंतर फिलहाल प्रायोजन समझौते में सबसे बड़ी रुकावटों में से एक नजर आता है।
BCCI की कुछ शर्तों ने भी घटाए विकल्प
टाइटल स्पॉन्सरशिप के लिए BCCI ने कुछ कारोबारी श्रेणियों को बोली से बाहर रखा है। इनमें ऑटोमोबाइल टायर, पेंट्स और स्पोर्ट्सवियर जैसी श्रेणियां शामिल हैं।
इसका सीधा असर संभावित बोलीदाताओं की संख्या पर पड़ सकता है।
ऐसे ब्रांड, जो भारतीय क्रिकेट की बड़ी पहुंच का फायदा उठाना चाहते हैं, अगर प्रतिबंधित श्रेणी में आते हैं तो वे इस अधिकार के लिए बोली नहीं लगा सकते।
इसलिए यहां सिर्फ कीमत ही नहीं बल्कि बोली लगाने वाली कंपनियों की सीमित संख्या भी एक महत्वपूर्ण कारण हो सकती है।
IPL से मिल रही है BCCI को कड़ी चुनौती
भारतीय क्रिकेट में कंपनियों के विज्ञापन और प्रायोजन बजट के लिए सबसे बड़ा आकर्षण अब भी आईपीएल है।
आईपीएल ने भारतीय क्रिकेट के व्यावसायिक माहौल को काफी बदल दिया है। कंपनियों को एक ही टूर्नामेंट में कई टीमों, स्टार खिलाड़ियों और लगातार मैचों के जरिए बड़ी संख्या में दर्शकों तक पहुंचने का मौका मिलता है।
इसके मुकाबले किसी द्विपक्षीय अंतरराष्ट्रीय सीरीज में मैचों की संख्या सीमित होती है और कई बार मुकाबलों के बीच लंबा अंतर भी होता है।
यही वजह है कि कंपनियों के लिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि टीम इंडिया कितनी लोकप्रिय है।
बल्कि सवाल यह भी है कि इस प्रायोजन में मिलने वाली पहचान उसकी कीमत के बराबर है या नहीं।
छोटा अधिकार चक्र भी बन सकता है परेशानी
BCCI द्वारा जारी अधिकार चक्र में करीब 35 भुगतान वाले अंतरराष्ट्रीय मैच शामिल हैं। यह अधिकार मार्च 2028 तक का है।
कम मैचों वाले छोटे प्रायोजन चक्र में किसी कंपनी के लिए बड़ी रकम का निवेश करना ज्यादा कठिन हो सकता है। कंपनियां अक्सर लंबे समय के अधिकार और ज्यादा प्रचार अवसरों को प्राथमिकता देती हैं, ताकि उनके पास प्रचार अभियान चलाने के लिए ज्यादा समय हो।
यानी BCCI के सामने चुनौती सिर्फ कीमत की नहीं बल्कि कीमत, अवधि और मिलने वाले प्रचार अवसरों के बीच संतुलन की भी है।
क्या विराट-रोहित की गैरमौजूदगी का असर है?
यह सवाल इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है।
विराट कोहली और रोहित शर्मा भारतीय क्रिकेट के सबसे पहचानने योग्य चेहरों में रहे हैं। उनके टेस्ट और टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से दूर होने के बाद टीम इंडिया के घरेलू मैचों में स्टार पावर का एक हिस्सा निश्चित रूप से बदला है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय क्रिकेट की व्यावसायिक लोकप्रियता खत्म हो गई है।
अब टीम के पास शुभमन गिल, जसप्रीत बुमराह, ऋषभ पंत, यशस्वी जायसवाल और कई युवा खिलाड़ी हैं, जो आने वाले वर्षों में टीम इंडिया के नए प्रमुख चेहरे बन सकते हैं।
इसलिए इसे “सुपरस्टार कल्चर का अंत” कहना जल्दबाजी होगी। ज्यादा सही बात यह है कि भारतीय क्रिकेट फिलहाल एक पीढ़ीगत बदलाव से गुजर रहा है।
BCCI अब क्या कर रहा है?
रिपोर्ट्स के मुताबिक BCCI अब सिर्फ खुली बोली प्रक्रिया पर निर्भर रहने के बजाय संभावित कंपनियों के साथ सीधे बातचीत पर भी ध्यान दे रहा है।
इन बातचीत में गूगल जेमिनी, एसबीआई लाइफ और स्पिनी जैसी कंपनियों के नाम सामने आए हैं।
इसका मतलब यह है कि बोर्ड अभी प्रायोजन को लेकर घबराहट में नहीं है। BCCI के पास घरेलू सीजन शुरू होने से पहले बातचीत के जरिए नया समझौता हासिल करने का मौका है।
क्या BCCI को कीमत कम करनी पड़ेगी?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि BCCI अपनी रिजर्व कीमत कम करेगा।
बोर्ड के पास दो रास्ते हैं। पहला, वह 4.85 करोड़ रुपये प्रति मैच के अपने मूल्यांकन पर कायम रहे और ऐसे ब्रांड का इंतजार करे जो इस कीमत को सही माने।
दूसरा, अगर बातचीत से अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलती है तो व्यावसायिक शर्तों में कुछ बदलाव पर विचार किया जा सकता है।
हालांकि, BCCI के लिए अपनी प्रायोजन संपत्ति को कम कीमत पर बेचने की जल्दबाजी करना जरूरी नहीं है। टीम इंडिया की व्यावसायिक लोकप्रियता अभी भी मजबूत है और घरेलू सीजन में कई बड़े मुकाबले आने वाले हैं।
टीम इंडिया का घरेलू सीजन भी है बड़ा मौका
भारत का आगामी घरेलू अंतरराष्ट्रीय सीजन BCCI के लिए प्रायोजन के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा।
बड़े विरोधियों के खिलाफ टेस्ट, वनडे और टी20 मुकाबले होने पर दर्शकों की रुचि बढ़ सकती है। अगर युवा भारतीय खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन करते हैं और टीम लगातार जीत हासिल करती है, तो उनकी बाजार में लोकप्रियता भी बढ़ सकती है।
यही वजह है कि आने वाले महीनों में टीम के मैदान पर प्रदर्शन और BCCI की प्रायोजन रणनीति दोनों पर नजर रहेगी।
असली वजह क्या है?
अगर पूरी तस्वीर को देखें तो BCCI को नया टाइटल स्पॉन्सर मिलने में मुश्किल को सिर्फ विराट कोहली और रोहित शर्मा की गैरमौजूदगी से जोड़ना सही नहीं होगा।
इसके पीछे कई व्यावसायिक कारण एक साथ काम कर रहे हैं:
- 4.85 करोड़ रुपये प्रति मैच का ऊंचा रिजर्व प्राइस
- कुछ बड़ी कारोबारी श्रेणियों पर प्रतिबंध
- मार्च 2028 तक सीमित अधिकार अवधि
- आईपीएल के साथ प्रायोजन बजट की प्रतिस्पर्धा
- टीम इंडिया में पीढ़ीगत बदलाव
- कंपनियों का प्रायोजन से मिलने वाले लाभ को लेकर मूल्यांकन
यानी कहानी सिर्फ सुपरस्टार्स के जाने की नहीं है। यह भारतीय क्रिकेट के बदलते व्यावसायिक माहौल की भी कहानी है।
FAQs: Team India Title Sponsor
BCCI को नया Team India Title Sponsor क्यों नहीं मिल रहा है?
इसके पीछे कई वजहें बताई जा रही हैं। इनमें 4.85 करोड़ रुपये प्रति मैच का रिजर्व प्राइस, सीमित अधिकार अवधि, कुछ कारोबारी श्रेणियों पर प्रतिबंध और आईपीएल से प्रायोजन बजट की प्रतिस्पर्धा प्रमुख हैं।
BCCI ने Team India Title Sponsorship की कीमत कितनी रखी है?
BCCI ने नए अधिकारों के लिए रिजर्व प्राइस 4.85 करोड़ रुपये प्रति मैच रखा है।
क्या विराट कोहली और रोहित शर्मा की गैरमौजूदगी इसका कारण है?
यह एक संभावित कारण हो सकता है, लेकिन इसे एकमात्र वजह नहीं माना जा सकता। टीम इंडिया की प्रायोजन कीमत पर कई व्यावसायिक कारण असर डालते हैं।
Team India का नया Title Sponsor कौन हो सकता है?
फिलहाल कोई नया स्पॉन्सर आधिकारिक रूप से तय नहीं हुआ है। रिपोर्ट्स में गूगल जेमिनी, एसबीआई लाइफ और स्पिनी जैसी कंपनियों के साथ बातचीत का जिक्र है।
BCCI का नया Title Sponsorship Rights कितने समय के लिए है?
नया अधिकार चक्र मार्च 2028 तक है और इसमें करीब 35 भुगतान वाले अंतरराष्ट्रीय मैच शामिल हैं।